23/08/2025
इंसानियत की तारीख़ गवाह है कि जब-जब समाज में ज़ुल्म, नाइंसाफी और ऊँच-नीच का निज़ाम क़ायम हुआ, तब-तब कमज़ोर तबक़े को कुचलकर ताक़तवर लोग अपनी हुकूमत जमाते रहे। किसी को ऊँची जात का तमग़ा देकर सर पर बिठाया गया और किसी को नीची जात का ठप्पा लगाकर ज़लील किया गया।
मगर इस्लाम ने आते ही इस पूरी जहालत को चकनाचूर कर दिया। क़ुरआन पाक ने साफ़ ऐलान कर दिया,
ऐ लोगो! हमने तुम्हें एक मर्द और एक औरत से पैदा किया और तुम्हें क़बीलों और बिरादरियों में इसलिए बाँटा ताकि तुम एक-दूसरे को पहचान सको। अल्लाह के नज़दीक सबसे अफ़ज़ल वही है जो सबसे ज़्यादा परहेज़गार है।
इस्लाम का पैग़ाम बिल्कुल साफ है इंसान की बड़ाई उसके रंग, नस्ल, ख़ानदान या जात में नहीं, बल्कि उसके तक़्वा और नेक अमल में है।
रसूलुल्लाह ﷺ ने अपने आख़िरी ख़ुत्बे में फ़रमाया,
किसी अरब को किसी अजमी पर और किसी अजमी को किसी अरब पर कोई फ़ज़ीलत नहीं। न ग़ोरे को काले पर और न काले को ग़ोरे पर, सिवाए तक़्वा के
यानी इस्लाम ने इंसानियत को एक ही क़बीला बना दिया उम्मत-ए-मुस्लिमाह। यहाँ अमीर-ग़रीब, ऊँच-नीच, जात-पात और नस्ल का कोई मानी नहीं। सब एक ही सफ़ में खड़े होकर नमाज़ पढ़ते हैं, एक ही अल्लाह को सज्दा करते हैं, और एक-दूसरे के भाई हैं।
आज अगर मुसलमान जात-पात और ऊँच-नीच की बीमारी में पड़कर बँट रहे हैं तो ये दरअसल इस्लामी तालीमात से दूर होने की वजह से है।
इस्लाम का निज़ाम इंसाफ़ और बराबरी पर क़ायम है। यहाँ कोई ऊँचा-नीचा नहीं, सब एक उम्मत हैं। असली शान-दौलत, ख़ानदान या जात में नहीं अल्लाह की इबादत और इंसानों की खिदमत में है।
अल्लाह हमें पांच वक्त की नमाज़ बाजामात पढ़ने की तौफीक दे .....आमीन🤲🤲