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24/03/2015
22/03/2015
समाज को विद्वानों की जरुरत है और आज उनकी कमी का ही नतीजा है की भारतीय समाज का मार्गदर्शन करने वालों में पाखंडी सबसे आगे ...
16/03/2015

समाज को विद्वानों की जरुरत है और आज उनकी कमी का ही नतीजा है की भारतीय समाज का मार्गदर्शन करने वालों में पाखंडी सबसे आगे है, इसी वजह से आज समाज अन्धकार में पड़ा है, नई पीढ़ी में संस्कारों की कमी है, बच्चे विद्वानों, क्रांतिकारियों, ऋषि मुनियों से अधिक नट-कलाकारों के दीवाने है, फ़िल्मी भांडों का अनुशरण करते हुए सिगरेट शराब पीना सीख रहे है, छोटे कपडे पहनना, देर रात सड़कों पर भटकना, बलात्कार की बढती घटनाएं इन्हीं फिल्मों और फ़िल्मी भांडों की देन है,

फ़िल्मी भांडों के कहने का अनुशरण आज की पीढ़ी पहले करती है वही यदि कोई विद्वान कुछ कह दें तो उन्हें भाषण देने वाला कह कर दरकिनार कर देते है

बच्चों का आदर्श लक्ष्मीबाई, भगत सिंह आदि ना होकर सनी लिओनी जैसी वैश्याए हो गई है, समाज में विद्वानों की कमी का नतीजा आप देख रहे है, और यह कमी एक दिन विनाश का कारण भी बने तो अतिशयोक्ति नहीं है, समाजों में विद्वानों से अधिक भवनों के निर्माण को बल दिया जा रहा है जो अति दुखद है

वेदों की ओर लौटिये यही सत्य ज्ञान है

यजुर्वेद ३-५७ (3-57)

ए॒ष ते॑ रुद्र भा॒गः स॒ह स्वस्राम्बि॑कया॒ तञ्जु॑षस्व॒ स्वाहैष ते॑ रुद्र भा॒ग आ॒खुस्ते॑ प॒शुः ॥३-५७॥

Let's celebrate Vikrami samvatsar 2072 21march
15/03/2015

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जीवन में उन्नति के लिए शारीरिक शुद्धि के साथ साथ जरुरी है आत्मिक और बौद्धिक शुद्धि, केवल शरीर साफ़ करने मात्र से आप प्रति...
13/03/2015

जीवन में उन्नति के लिए शारीरिक शुद्धि के साथ साथ जरुरी है आत्मिक और बौद्धिक शुद्धि, केवल शरीर साफ़ करने मात्र से आप प्रतिष्ठा नहीं पाते इसके लिए जरुरी है की अपने बौद्धिक स्तर में सुधार लाते रहे और आत्मिक शुद्धि भी करते रहे

क्यूंकि ऐसा व्यक्ति कभी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर जो "मुहं में राम बगल में छुरी" जैसा आचरण रखता हो, जैसे एक तरफ तो आप किसी को सहयोग का वचन देते है, वही उसकी पीठ पीछे लोगों से उसकी बुराइयां करते फिरते हो, ऐसे आचरण से ना तो आप लोगों में अपनी प्रतिष्ठा बना पाते और जो बनी बनाई प्रतिष्ठा है वह भी खो देते है

इसलिए अपने आचरण को अच्छा बनाये, आत्मिक शुद्धि पर बल दें और यही शिक्षा अपने बच्चों को अवश्य दें, नित्य वेद का कम से कम एक मन्त्र जरुर पढ़े और उसे अपने जीवन में उतारे

यजुर्वेद ३-५४ (3-54)

आ न॑ एतु॒ मनः॒ पुनः॒ क्रत्वे॒ दक्षा॑य जीवषे॑ । ज्योक्च॒ सूर्यन्दृ॒शे ॥३-५४॥

भावार्थ:- मनुष्यों को (चाहिये कि) उत्तम कर्मों के अनुष्ठान के लिये चित्त की शुद्धि वा जन्म-जन्म में उत्तम चित्त की प्राप्ति ही की इच्छा करें,

जिससे मनुष्य जन्म को प्राप्त होकर ईश्वर की उपासना का साधन करके उत्तम-उत्तम धर्मों का सेवन कर सकें।।

उत्तम और समृद्ध जीवन के लिए शिक्षा ही एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ कुंजी है, आज समय की जरुरत है शिक्षित होना, स्वाध्याय करने स...
12/03/2015

उत्तम और समृद्ध जीवन के लिए शिक्षा ही एकमात्र और सर्वश्रेष्ठ कुंजी है, आज समय की जरुरत है शिक्षित होना, स्वाध्याय करने से आप पाखंडों से बचे रहते है, उतरोतर प्रगति करते रहते है, अन्यथा अशिक्षा अंधकारमय जीवन की ओर ले जाती है, समस्त परिजनों से निवेदन है की अपने बच्चों की शिक्षा में किसी प्रकार की कमी नहीं रखे, हर वर्ग जाती का बच्चा शिक्षा का अधिकार रखता है, शिक्षा कभी जात पात नहीं पूछती है

बाल मजदूरी में फसे बच्चों को निकाल कर उन्हें शिक्षित करने का कार्य करें, क्यूंकि यही बच्चे भावी भारत के आधार बनेंगे, शिक्षित बालवर्ग ही शिक्षित भारत बनेगा यह आप पर निर्भर करता है की देश को किस दिशा की ओर बढ़ता हुआ देखना चाहते है

यजुर्वेद ३-५३ (3-53)

मनो॒ न्वाह्व॑महे नारा॒शसे॑न॒ स्तोमे॑न । पि॑तॄ॒णाञ्च॒ मन्म॑भिः ॥३-५३॥

भावार्थ:- मनुष्यों को मनुष्यजन्म की सफलता के लिये विद्या आदि गुणों से युक्त मन को करना चाहिये।

जैसे ऋतु अपने-अपने गुणों को क्रम-क्रम से प्रकाशित करते हैं, तथा जैसे विद्वान् लोग क्रम-क्रम से अनेक प्रकार की अन्य-अन्य विद्याओं को साक्षात्कार करते हैं,

वैसा ही पुरुषार्थ करके सब मनुष्यों को निरन्तर विद्या और प्रकाश की प्राप्ति करनी चाहिये।।

ईश्वरीय ज्ञान वेदों में भी यही बताया है, की ईश्वर एक ही है, और वह निराकार और जन्म मरण के चक्र से मुक्त है, उपासना केवल उ...
11/03/2015

ईश्वरीय ज्ञान वेदों में भी यही बताया है, की ईश्वर एक ही है, और वह निराकार और जन्म मरण के चक्र से मुक्त है, उपासना केवल उसी की होनी चाहिए अन्यों की नहीं, जैसे हमने आज ईश्वर को कई रूप दे दिए है जो गलत ही नहीं अधर्म भी है, ईश्वर उपासना के लिए यज्ञ ही सर्वश्रेष्ठ है, पाखंडों में पड़कर जगह जगह ईश्वर के नाम से लगी मुर्तिया पूजना अधर्म की श्रेणी में आता है, सम्पूर्ण चार वेदों में कही भी मूर्ति पूजा का विधान नहीं है, वही यज्ञ के लिए हर जगह कहा गया है,

इसलिए हमें चाहिए की पाखण्ड को त्याग कर उस परमपिता की उपासना करें जो निराकार, अजन्मा, अन्तर्यामी है, उसकी उपासना के लिए नित्य यज्ञ संध्या आदि करें, अपने बच्चों को भी समझाए, उन्हें बचपन में ही यज्ञ कीरन सिखाये जिससे वह कभी भी पाखंडों का शिकार ना हो

यजुर्वेद ३-५२ (3-52)

सु॑सन्दृशं॑ त्वा व॒यम्मघ॑वन्वन्दिषी॒महि॑ । प्र नू॒नम्पू॒र्णब॑न्धुर स्तु॒तो या॑सि॒ वशाँ॒ अनु॒ योजा॒ न्वि॑न्द्र ते॒ हरी॑ ॥३-५२॥

भावार्थ:- इस मन्त्र में श्लेष और उपमालंकार हैं।

मनुष्यों को सब जगत् के हित करने वाले जगदीश्वर ही की स्तुति करनी और किसी की न करनी चाहिये, क्योंकि जैसे सूर्यलोक सब मूर्तिमान् द्रव्यों का प्रकाश करता हैं, वैसे उपासना किया हुआ ईश्वर भी भक्तजनों के आत्माओं में विज्ञान को उत्पन्न करने से सब सत्यव्यवहारों को प्रकाशित करता है।

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