04/07/2026
महान दिगंबर संत आचार्य श्री १०८ वर्धमान सागर जी महाराज (दक्षिण) ने 24 जून 2026 को सुबह 8:40 बजे दक्षिण भारत में अपनी यम सल्लेखना (समाधि मरण) की घोषणा की है। वे जैन धर्म के महान साधक हैं और उनकी दीक्षा परंपरा आचार्य शांति सागर जी महाराज से जुड़ी हुई है।
सल्लेखना का संपूर्ण अर्थ -
सल्लेखना मृत्यु महोत्सव का , साधना की परीक्षा करने का , समतापूर्वक देह को विदा करने का उपकर्म है। यह संसार समुद्र जनम मरण रूप जल प्रवाह वाला , दुःख ,कलेश और शौक रूप तरंगो वाला है। इसे सम्यग्दर्शन, सम्यन्गज्ञान , सम्यग्चारित्र और साम्यग तप रूप चतुरंग नाव से मोक्ष के अभिलाषी जन पार करते है।
इन्द्रिय आसक्त परलोक की चिंता से रहित, पांच करोड़ अड़सठ लाख निन्यानवे हज़ार पांच सौ चौरासी रोगो को देखते हुए भी नहीं देखता है। दुर्लभ मानुष पर्याय के प्राप्त होने पर भी आत्मा का उन्नति करक प्रयास नहीं करता। जैन आगम के अनुसार यह जीव कर्मो के आधीन चौरासी लाख योनियों में भटकता है। बार बार जन्म और मृत्यु अत्यंत दुखदायी है। इस उत्तम मानव योनि प्राप्त होने पर भी कोई एकाध भव्य ही सल्लेखना करने को प्रवृत होते है। जीवन का परम उदेश्य इस जन्म मरण के चक्र से मुक्ति पाना है। इस कारण महान आत्माओ ने इसका उपाय किया और सिद्ध अवस्था को प्राप्त किया जिसके पश्चात मुक्ति पाकर चिरकाल तक स्वधाम में स्थित हुए।
सल्लेखना अर्थात सत + लेखना। इस क्रिया को करने वाला व्यक्ति ज्ञान, ध्यान में सलग्न रहता है। उसका शरीर का कोई मूल्य नहीं रह जाता अपितु शांति ही उसका शरीर, देश, स्वरुप सर्वस्व हो जाता है। स्वाध्याय, चिंतन , आत्मध्यान करना ही इस योगी की निरंतर क्रिया हो जाती है।
समाधिमरण का अर्थ आत्महत्या नहीं है, यह कथन बिलकुल भ्रमपूर्ण है। परम योगी सदैव अपने शरीर के प्रति जाग्रत रहता है। जब भी उसे वृद्ध अवस्था का ज्ञान होने लगता है अर्थात कोई रोग या ऐसे चिह्न जो उनकी साधना, तपस्या, ध्यान में बाधक बनते दिखाई देने लगते हैं तो वह योगी सरलता से अपनी देह से अपना लक्ष्य हटा कर अंतर्ध्यान में लीन होने का अत्यधिक प्रयास करना आरम्भ कर देता है। जगत के सभी प्राणियों, पदार्थ, उपकरणों, शास्त्रों के प्रति न कोई राग भाव और न कोई देवेष भाव रखता है। शरीर संभंधित जीवो से बदला लेने या दुःख देने की भावना का पूर्ण रूप से त्याग कर शांति पूर्वक इस संसार से विदाई ले लेता है और इस प्रकार आत्मा सब के प्रति समता धारण कर ज्ञान धरा में प्रवेश कर जाता है। इस क्रिया काल में उसकी जीने का आकर्षण , मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। सभी इन्द्रियों के प्रति आसक्ति जैसे की खाना , पीना , सुनना, कहना पूर्ण रूप से समाप्तः हो जाती है फिर इस स्थति में चाहे वह कितने ही माह निकाल दे या फिर आज ही देह त्याग दे इसका कोई भय नहीं रहता।
जीवन प्रयन्त समाधिमरण की भावना से जीना होता है। यह आजीवन किया गया कायोत्सर्ग का अभ्यास है। सल्लेखना शांति के उपासक की मृत्यु है , एक सच्चे वीर का महान पराक्रम है। इस से पहले की शरोर जवाब दे वह स्वयं उसे समता पूर्वक जवाब दे देता है।
सल्लेखना को परिभाषित करने का यह क्षुद्र प्रयास भर है। मूल रूप से समाधिमरण का काल , यम , वह नियम का पूर्ण उल्लेख नहीं कर सकते इसका पूर्ण ज्ञान शास्त्र अध्यन से ही ज्ञात हो सकता है।
- तरंग अरविंद चौधरी सागर
आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज Ganini Pramukh Aryika Shiromani GYANMATI Mata Ji Muni Shri