Yado ki Virasat

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--यादों की विरासत --
यहाँ हम उन सुनहरी लम्हों को संजोते हैं, जो वक्त के साथ धुंधले तो हो जाते हैं, पर दिल से कभी मिटते नहीं।
पुरानी तस्वीरें, कहानियाँ, किस्से और संस्कृति से जुड़ी झलकियाँ यही है हमारी असली पूँजी, हमारी विरासत है

IRCTC तत्काल टिकट बुक नहीं हो पा रहे, जबकि पिछले 15 सालों से आसानी से बुक हो जाते थे।क्या समस्या है, किसी को कुछ पता नही...
28/05/2026

IRCTC तत्काल टिकट बुक नहीं हो पा रहे, जबकि पिछले 15 सालों से आसानी से बुक हो जाते थे।
क्या समस्या है, किसी को कुछ पता नहीं। क्या आपको भी ऐसी समस्या आ रही है?

एक समय था जब हर किसी के पास मोबाइल फोन नहीं होता था। उस दौर में लोगों के लिए सबसे बड़ा सहारा हुआ करता था — सिक्के डालकर ...
28/05/2026

एक समय था जब हर किसी के पास मोबाइल फोन नहीं होता था। उस दौर में लोगों के लिए सबसे बड़ा सहारा हुआ करता था — सिक्के डालकर चलने वाला टेलीफोन, जिसे हम PCO या कॉइन बॉक्स फोन भी कहते थे। गांव हो या शहर, बस अड्डा हो या रेलवे स्टेशन, यह सिक्के वाला टेलीफोन हर जगह दिखाई देता था।
जब किसी अपने से जरूरी बात करनी होती, तो जेब में एक या दो रुपये के सिक्के लेकर लोग PCO तक दौड़ पड़ते थे। नंबर मिलाते समय दिल में एक अलग ही उत्साह होता था। जैसे ही सिक्का अंदर गिरता, फोन की घंटी बजती और दूर बैठे अपने लोगों की आवाज सुनकर मन खुश हो जाता था।
उस समय बातचीत भी बहुत संभलकर की जाती थी, क्योंकि हर मिनट का पैसा लगता था। कई बार लाइन लगाकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता था। गांवों में तो यह फोन लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं था। बाहर काम करने गए बेटे या रिश्तेदार की खबर इसी से मिलती थी।
आज मोबाइल और इंटरनेट के जमाने में ये सिक्के वाले टेलीफोन लगभग गायब हो चुके हैं, लेकिन उनकी यादें आज भी लोगों के दिलों में जिंदा हैं। वह दौर सादगी, अपनापन और इंतजार की मिठास से भरा हुआ था।
आपने कभी सिक्के डाल कर फोन पर बात की कॉमेंट मे जरूर बताये??



28/05/2026

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27/05/2026

HMT tractor old memories❤

ट्रैक्टर सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि किसान का सबसे बड़ा साथी है। जिस खेत को पहले बैलों से जोतने में कई दिन लग जाते थे, आज ...
27/05/2026

ट्रैक्टर सिर्फ एक मशीन नहीं, बल्कि किसान का सबसे बड़ा साथी है। जिस खेत को पहले बैलों से जोतने में कई दिन लग जाते थे, आज वही काम ट्रैक्टर कुछ घंटों में कर देता है।
पुराने समय में किसान दिन-रात मेहनत करके खेती करते थे, लेकिन ट्रैक्टर आने के बाद खेती का तरीका ही बदल गया। हल चलाने से लेकर बुवाई, सिंचाई और फसल ढोने तक, हर काम में ट्रैक्टर ने किसानों का हाथ मजबूत किया है।
गांव की मिट्टी में दौड़ता हुआ ट्रैक्टर किसान की मेहनत, उम्मीद और आत्मविश्वास की पहचान बन चुका है। जब खेतों में ट्रैक्टर की आवाज गूंजती है, तो ऐसा लगता है मानो गांव की जिंदगी चल पड़ी हो।
किसान और ट्रैक्टर का रिश्ता मेहनत और भरोसे का रिश्ता है, क्योंकि किसान देश का पेट भरता है, और ट्रैक्टर उसकी ताकत बनकर हर कदम पर साथ निभाता है।

अगर आप गाँव और किसान परिवार से जुड़े है तो बताये आपके घर
पहला ट्रैक्टर कौन सा था??



26/05/2026

रेडियो पार्ट

केरोसिन वाला ये लैम्प सिर्फ रोशनी का साधन नहीं था,बल्कि पुराने दौर की खूबसूरत यादों का एक अनमोल हिस्सा था।जब गांवों में ...
26/05/2026

केरोसिन वाला ये लैम्प सिर्फ रोशनी का साधन नहीं था,
बल्कि पुराने दौर की खूबसूरत यादों का एक अनमोल हिस्सा था।
जब गांवों में शादी-ब्याह या कोई बड़ा समारोह होता था, तब यही लैम्प पूरी रात उजाला करते थे। मुझे आज भी याद है, खासकर शादियों में इन्हें वैसे ही बुक किया जाता था जैसे बैंड-बाजे वालों को किया जाता है। जरूरत के हिसाब से इन्हें अलग-अलग जगहों पर रखा जाता था
एक वहाँ जहाँ बारात ठहरी होती,
एक वहाँ जहाँ हलवाई पकवान और मिठाइयाँ बना रहे होते,
और एक शादी के मंडप के पास।
इन लैम्पों की देखभाल के लिए एक आदमी की अलग से ड्यूटी होती थी, जो समय-समय पर तेल भरता और हवा चेक करता रहता था ताकि रोशनी लगातार बनी रहे।
और जब बारात “द्वारचार” के लिए निकलती थी, तब एक आदमी इस लैम्प को कंधे पर उठाकर सबसे आगे चलता था, और पीछे पूरी बारात नाचते-गाते, झूमते हुए चलती थी। उस पीली रोशनी में गांव की वो रौनक देखने लायक होती थी।
उस समय गांवों में अच्छी रोशनी का यही सबसे बड़ा सहारा था। बाद में LPG गैस वाले पेट्रोमैक्स आए, लेकिन केरोसिन वाले इन लैम्पों की बात ही कुछ और थी।
इनकी रोशनी में सिर्फ उजाला नहीं, बल्कि अपनापन, खुशी और पुराने दिनों की मिठास भी बसती थी।
क्या आपने भी ऐसे लैंप किसी शादी मे देखे है?
कृपया कॉमेंट कर के बताये


पुराने टाइम्पो की बात ही कुछ और थी।उनकी आवाज़ दूर से ही पहचान में आ जाती थी, और सफर में एक अपनापन महसूस होता था। गाँव की...
25/05/2026

पुराने टाइम्पो की बात ही कुछ और थी।
उनकी आवाज़ दूर से ही पहचान में आ जाती थी, और सफर में एक अपनापन महसूस होता था। गाँव की गलियों से लेकर शहर की भीड़ तक, ये टाइम्पो लोगों की रोज़मर्रा की जिंदगी का अहम हिस्सा थे।
गर्मी हो या सर्दी, धूल भरी सड़कें हों या बारिश का मौसम पुराने टाइम्पो हर हाल में चलते रहते थे। उनमें आराम भले कम था, लेकिन यादें भरपूर थीं। कई लोगों का बचपन, स्कूल का सफर और बाजार की यात्राएँ इन्हीं टाइम्पो में बीती हैं।
और किराया भी बहुत कम था

आज भले नई गाड़ियाँ आ गई हों, लेकिन पुराने टाइम्पो की खड़खड़ाहट और उनका देसी अंदाज़ आज भी दिल में पुरानी यादें ताज़ा कर देता है।



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